दर्द में तुम जो हो
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| What is spirituality? |
नींद मेरी आँखों में नही
मेरी आँखों में तुम जो हो
सहर तक मैं दुआएँ पढ़ती रही
दर्द में तुम जो हो
बेबस कदम मेरे
आँखे नीर बहाती रही
अल्फाजों पर लगे थे पहरे
डर में, मैं सिमटी रही
हर साँस ने सीने में चुभन दी
धड़कनों में तुम जो हो
नैतिकता और समाज
क्या समझ पायेंगे
मेरे जज्बात
मेरे अंदर, मैं थोड़ी-सी
बाकी तुम जो हो
लाचार रिश्ता था मेरा
प्यार स्वछन्द था मर्यादाओं से
तुम्हारी बदन के हर टीस से
मुझमें भी सूईया चुभती रहीं
सहर तक मैं दुआएँ पढ़ती रही
दर्द में तुम जो हो।
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